फ़रवरी 4, 2026

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नई जनसंख्या नीति पर बहस: ‘हम दो, हमारे तीन’ की वकालत करते RSS प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में नई दिल्ली में आयोजित ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ व्याख्यानमाला कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या नीति पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब केवल ‘हम दो, हमारे दो’ की नीति से आगे बढ़कर ‘हम दो, हमारे तीन’ की सोच अपनाने की जरूरत है।

भागवत का बयान: तीन संतान क्यों ज़रूरी?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि विश्व के सभी शास्त्र और शोध बताते हैं कि अगर किसी समाज की जन्मदर तीन से कम होती है, तो वह धीरे-धीरे लुप्त होने लगता है। उन्होंने डॉक्टरों के हवाले से कहा कि विवाह में अधिक देरी न करना और तीन संतान होना माता-पिता और बच्चों दोनों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

भागवत ने कहा, “भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को यह देखना चाहिए कि उसके घर में तीन संतान होनी चाहिए। डॉक्टर कहते हैं कि तीन संतान से माता-पिता स्वस्थ रहते हैं और बच्चे भी आपस में सहयोग और ईगो मैनेजमेंट सीखते हैं। झगड़े कम होते हैं और परिवार का संतुलन बना रहता है।”

‘2.1 का औसत मतलब 3 बच्चे’

संघ प्रमुख ने देश के औसत जन्मदर (2.1) पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि गणितीय रूप से यह 2.1 दिखता है, लेकिन मानव जीवन में इसका अर्थ है तीन बच्चे। उन्होंने स्पष्ट किया कि तीन से आगे नहीं बढ़ना चाहिए क्योंकि परिवार को अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चों का लालन-पालन करना होगा।

जनसांख्यिकी और सुरक्षा का मुद्दा

मोहन भागवत ने यह भी कहा कि जनसंख्या केवल संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह जनसांख्यिकी (demography) और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं की जन्मदर पहले से ही कम थी और अब और कम हो रही है। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

उनका कहना था कि समाज को नई पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि तीन बच्चे पैदा करने की सोच को अपनाया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि जनसांख्यिकी में बदलाव के परिणाम लंबे समय तक दिखाई देते हैं, इसलिए अभी से कदम उठाने जरूरी हैं।

सामाजिक और पारिवारिक संतुलन पर ज़ोर

भागवत ने यह भी कहा कि तीन बच्चे होने से परिवारों में बेहतर सामंजस्य रहता है। बच्चों के बीच सामंजस्य और सहयोग की भावना विकसित होती है। इससे पारिवारिक स्थिरता के साथ-साथ समाज में भी संतुलन बना रहता है।

नीतिगत बदलाव की दिशा में संकेत?

RSS प्रमुख का यह बयान जनसंख्या नीति पर नई बहस को जन्म देता है। लंबे समय से ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा भारतीय परिवारों में प्रचलित रहा है, लेकिन अब भागवत की ओर से ‘हम दो, हमारे तीन’ की बात करना इस दिशा में नीतिगत बदलाव की संभावना की ओर संकेत करता है।

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