उद्धव गुट का बड़ा हमला: “राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव में अनुपस्थित रहने वाली पार्टियों का पंजीकरण रद्द हो!”
मुंबई, 12 सितम्बर 2025।
शिवसेना (UBT) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर बड़ा मुद्दा उठाया है। पार्टी ने न केवल मतदान को अनिवार्य करने की मांग की, बल्कि उन राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की बात भी कही है, जो इन शीर्ष संवैधानिक चुनावों से दूर रहते हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने बीआरएस (BRS), बीजेडी (BJD) और अन्य दलों को सीधा निशाने पर लिया और आरोप लगाया कि वे केंद्रीय जांच एजेंसियों के डर से चुनाव से दूर रहे।
[Google Ads Space]
🔹 “मतदान से दूर रहना असंवैधानिक है” – सामना
संपादकीय में लिखा गया:
- बीआरएस, बीजेडी और कुछ अन्य दल 9 सितम्बर को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव से दूर रहे।
- यह फैसला “केंद्रीय एजेंसियों के डर” में लिया गया।
- संपादकीय में स्पष्ट शब्दों में कहा गया: “यह असंवैधानिक है।”
🔹 शिवसेना (UBT) की मांग
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में कोई भी निर्वाचक अनुपस्थित न रहे, इसके लिए कानूनी प्रावधान किया जाए।
- जो पार्टियां खरीद-फरोख्त में शामिल होती हैं या मतदान का बहिष्कार करती हैं, उनका पंजीकरण रद्द किया जाए।
- भविष्य में सत्तारूढ़ दलों द्वारा “क्रॉस वोटिंग” और “डील” रोकने के लिए कड़ा कानून बनाया जाए।
[Google Ads Space]
🔹 नतीजों पर भी उठाए सवाल
- उपराष्ट्रपति चुनाव में NDA उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन को 452 वोट मिले और विपक्षी उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी को 300।
- 15 वोट अवैध घोषित किए गए।
- शिवसेना (UBT) का दावा है कि इनमें से अधिकतर अवैध वोट रेड्डी को मिले।
- पार्टी ने सवाल किया कि जब सहयोगी दलों ने “खरीद-फरोख्त” का दावा किया तो निर्वाचन आयोग क्या कर रहा था?
🔹 विपक्षी INDIA गठबंधन पर टिप्पणी
संपादकीय में यह भी कहा गया कि:
- “दो से पांच सांसदों को छोड़कर INDIA गठबंधन के किसी भी सांसद ने विश्वासघात नहीं किया।“
- आरोप लगाया गया कि जिन सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की, उन्हें विदेश यात्राओं की “सुविधा” दी गई।
[Google Ads Space]
📌 निष्कर्ष
उद्धव गुट का यह तीखा संपादकीय सिर्फ BRS और BJD पर ही हमला नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या वास्तव में भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों के चुनाव में राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता पर भरोसा किया जा सकता है। अब देखना होगा कि क्या इस विवाद के बाद निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार मतदान प्रक्रिया को और अधिक कठोर बनाने की दिशा में कोई कदम उठाती है या नहीं।






