“वो आखिरी सवेरा — इंदिरा गांधी की अमर कहानी”
🕊️ इंदिरा गांधी की शहादत: वह सुबह जिसने भारत की आत्मा को रुला दिया 🕊️
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 1984 —
आज से ठीक 41 वर्ष पहले, वह सुबह थी जब सूरज तो उगा था, पर हिंदुस्तान के आकाश पर एक गहरा साया छा गया। यह वही सुबह थी जब भारत की लौह महिला, श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी ही सुरक्षा में तैनात दो अंगरक्षकों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। समय था — सुबह के लगभग 9 बजकर 20 मिनट।
प्रधानमंत्री आवास, 1, अकबर रोड से निकलकर वह अपने इंटरव्यू के लिए जा रही थीं। सफेद साड़ी पर हल्की नीली किनारी, चेहरे पर आत्मविश्वास की वही पुरानी चमक, और कदमों में हमेशा की दृढ़ता। लेकिन नियति ने उस दिन कुछ और ही तय कर रखा था।
जैसे ही इंदिरा जी ने अपने अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के सामने से कदम बढ़ाया, अचानक बंदूकें तान दी गईं — और कुछ ही सेकंड में गोलियों की बौछार ने देश की सबसे शक्तिशाली महिला को ज़मीन पर गिरा दिया।
घायल अवस्था में उन्हें AIIMS ले जाया गया। डॉक्टरों ने लगातार घंटेभर तक प्रयास किया, पर भारत माँ की यह बेटी अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह गई।
सुबह 9:30 पर — देशभर के रेडियो ने घोषणा की —
“भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी अब हमारे बीच नहीं रहीं…”
उस क्षण जैसे पूरा भारत थम गया था।
सड़कें सुनसान हो गईं, लोगों की आँखों में अविश्वास था। कोई रो रहा था, कोई बस आसमान को देखता हुआ पूछ रहा था — “क्यों?”
इंदिरा जी सिर्फ एक नेता नहीं थीं, वो एक युग थीं — जिसने भारत को आत्मनिर्भरता, विज्ञान, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई।
1971 के युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति, परमाणु शक्ति परीक्षण, हरित क्रांति — ये सब उसी महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम था।
उनकी मृत्यु के बाद, देश में हिंसा भड़क उठी, पर इतिहास गवाह है कि इंदिरा गांधी ने खुद एक बार कहा था —
“अगर मैं मर भी जाऊँ, तो हर बूंद खून इस देश की मिट्टी को और मज़बूत करेगी।”
आज भी जब लोग 31 अक्टूबर की तारीख़ याद करते हैं, तो आँखें नम हो जाती हैं।
वह दिन सिर्फ इंदिरा गांधी की हत्या का दिन नहीं था —
वह दिन था जब भारत ने अपनी “माँ जैसी नेता” खो दी थी।
🕯️ भारत माँ की उस वीर बेटी को श्रद्धांजलि, जिसने अपने देश के लिए जीया और देश के लिए ही प्राण न्योछावर कर दिए। 🇮🇳
(An Emotional Story of the Day India Lost Its Iron Lady)







