29 अक्टूबर विशेष: जनजातीय नायक कार्तिक उरांव — जंगल से संसद तक का सफर
रांची, 29 अक्टूबर। आज देश उस महान जननायक को याद कर रहा है, जिसने आदिवासी समाज की आवाज़ को दिल्ली की संसद तक पहुंचाया — नाम है कार्तिक उरांव। 29 अक्टूबर 1924 को झारखंड के गुमला ज़िले के लिटाटोली गाँव में जन्मे कार्तिक उरांव न सिर्फ़ एक नेता थे, बल्कि आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान के प्रतीक भी थे।
बचपन और शिक्षा
एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे कार्तिक उरांव बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और विदेश जाकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इंग्लैंड से शिक्षा पूरी करने के बाद वे भारत लौटे और जनसेवा को अपना जीवन उद्देश्य बना लिया।
राजनीति में कदम और जनसेवा
कार्तिक उरांव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और झारखंड के लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से कई बार लोकसभा सदस्य बने। संसद में उन्होंने आदिवासी समाज के हक़ और अधिकारों के लिए सशक्त आवाज़ उठाई। वे अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के संस्थापक भी रहे, जिसका उद्देश्य था—जनजातीय समाज को शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक सम्मान की मुख्यधारा से जोड़ना।
आदिवासी समाज के मसीहा
लोग उन्हें “आदिवासियों का मसीहा” कहते हैं। कार्तिक उरांव का मानना था कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब उसकी जड़ें मज़बूत हों। उन्होंने आदिवासी युवाओं में आत्मविश्वास जगाया और शिक्षा को हथियार बनाकर गरीबी से लड़ने का आह्वान किया।
आज का महत्व
29 अक्टूबर का दिन हर साल झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में कार्तिक उरांव जयंती के रूप में मनाया जाता है। उनके आदर्श आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं कि समाज में बदलाव लाने के लिए संकल्प, संघर्ष और समर्पण—तीनों ज़रूरी हैं।






