फ़रवरी 4, 2026

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भूकंप रूस के तट के पास, खतरा जापान-अमेरिका तक: क्या है रिंग ऑफ फायर, जिसके चलते दर्जनभर देशों में अलर्ट?

रूस में आए एक तीव्र भूकंप की वजह से दुनिया के इतने देशों में सुनामी का अलर्ट क्यों जारी किया गया है? यह रिंग ऑफ फायर क्या है, जिसकी वजह से सुनामी का खतरा कई हजारों किलोमीटर की दूरी तक पैदा हो रहा है? भारत इस खतरे से कैसे बचा है? आइये जानते हैं…

प्रशांत महासागर में रिंग ऑफ फायर सबसे ज्यादा भूकंप प्रभावित क्षेत्र।

रूस के दूरस्थ पूर्वी तटीय क्षेत्र में स्थित कैमचटका प्रायद्वीप पर बुधवार को आए जबरदस्त 8.8 तीव्रता के भूकंप ने एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक सुनामी का खतरा पैदा कर दिया है। रूस के अलग-अलग क्षेत्रों के साथ जापान और अमेरिका के हवाई तक में लाखों लोगों को तटीय क्षेत्रों से दूर ले जाया जा रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जहां अमेरिका के हवाई में छह फीट ऊंची लहरें तक रिकॉर्ड की गई हैं, वहीं जापान में फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को खाली कराना शुरू कर दिया गया है। इसके अलावा फिलीपींस से न्यूजीलैंड तक सुनामी का हाई अलर्ट जारी किया गया है। 

अलग-अलग देशों में सुनामी के खतरों के बीच यह जानना अहम है कि आखिर रूस में आए एक तीव्र भूकंप की वजह से दुनिया के इतने देशों में सुनामी का अलर्ट क्यों जारी किया गया है? यह रिंग ऑफ फायर क्या है, जिसकी वजह से सुनामी का खतरा कई हजारों किलोमीटर की दूरी तक पैदा हो रहा है? आइये जानते हैं…

क्या है रिंग ऑफ फायर?
दुनिया में मौजूदा समय में बड़े हिस्सों में ज्वालामुखी जमीन के ऊपर मौजूद हैं। हालांकि, इनकी एक बड़ी संख्या महासागर और समुद्रों की गहराई में भी है। खासकर प्रशांत महासागर में कई सदियों से ज्वालामुखी मौजूद हैं। इतना ही नहीं, एक विशाल क्षेत्र होने की वजह से प्रशांत महासागर में कई टेक्टॉनिक प्लेट्स (विवर्तनिक प्लेट्स) भी हैं, जिनका समय-समय पर जगह बदलना भूकंप का कारण बनता है।

प्रशांत महासागर में जहां-जहां यह ज्वालामुखी भूकंप के केंद्रों के करीब हैं, उन्हें जोड़ने वाली रेखा को रिंग ऑफ फायर कहा जाता है। यह एक अर्धचंद्र या घोड़े की नाल के आकार का क्षेत्र है, जो कि 40 हजार 250 किलोमीटर की दूरी तक फैला है। जियोलॉजीइन वेबसाइट के मुताबिक, रिंग ऑफ फायर में जो टेक्टॉनिक प्लेट्स मौजूद हैं, उनमें यूरेशियन, उत्तरी अमेरिकी प्लेट, हुआ डी फुका, कोकोज, कैरिबियाई प्लेट, नाजका प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, इंडियन, ऑस्ट्रेलियाई, फिलीपींस और कुछ अन्य छोटी प्लेट्स शामिल हैं। यह सब मिलकर एक बड़ी प्रशांत प्लेट का हिस्सा हैं।

हजारों किलोमीटर के दायरे में आने वाली यह प्लेट्स 15 से ज्यादा देशों को कवर करती हैं। इन देशों में रूस, अमेरिका, इंडोनेशिया, मैक्सिको, जापान, कनाडा, ग्वाटेमाला, चिली, पेरू, फिलीपींस और कुछ अन्य देश शामिल हैं। 

रिंग ऑफ फायर में भूकंप का खतरा ज्यादा क्यों?
रिंग ऑफ फायर यानी आग के वृत्त (अर्धवृत्त) में इतनी सारी टेक्टॉनिक प्लेट्स की मौजूदगी इसे खतरनाक बनाती है। दरअसल, यह प्लेट्स लगातार एक-दूसरे से टकराती रहती हैं। ऐसे में किसी दो प्लेट्स के टकराने का असर दूसरी प्लेट्स पर भी देखने को मिलता है और यह एक के बाद एक प्रशांत क्षेत्र में बड़े भूकंप का कारण बनता है। 

प्रशांत महासागर में रिंग ऑफ फायर में कुल मिलाकर 450 से 550 सक्रिय और असक्रिय ज्वालामुखी हैं, जिनका निर्माण प्रशांत महासागर के तल पर आने वाले भूकंपों की वजह से हुआ है। विश्व में मौजूदा समय में जितने सक्रिय ज्वालामुखी हैं, उनमें से 75 फीसदी इस वक्त प्रशांत महासागर के रिंग ऑफ फायर में आने वाले क्षेत्र में पड़ते हैं। ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, जब भी इन ज्वालामुखी में मैग्मा (पृथ्वी की सतह के नीचे ज्वालामुखी के केंद्र में पाया जाने वाला पिघला हुआ चट्टानी तत्व) गतिविधियां तेज करता है तो यह आसपास मौजूद टेक्टॉनिक प्लेट्स में भी हलचल पैदा कर देता है। नतीजतन रिंग ऑफ फायर में भूकंप की संभावना काफी बढ़ जाती है। 

प्रशांत महासागर में भूकंप के बाद सुनामी का खतरा कितना?
टेक्टॉनिक प्लेट्स का टकराना और ज्वालामुखी में हलचल पैदा होना एक चक्र की तरह होता है। यानी टेक्टॉनिक प्लेट्स की हलचल भूकंप का कारण बनकर ज्वालामुखी को सक्रिय करती। बदले में ज्वालामुखी के मैग्मा में होने वाली गतिविधि टेक्टॉनिक प्लेट्स में हलचल का कारण बनती है। चूंकि दुनिया के सबसे ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी प्रशांत महासागर के अंतर्गत रिंग ऑफ फायर में आते हैं, इसलिए इनकी हलचल से एक तीव्र भूकंप इसके आसपास मौजूद देशों में कई मीटर ऊंची लहरों (सुनामी) के खतरे को सबसे ज्यादा देता है।

रूस के तटीय इलाके पर आए भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.8 मापी गई है। यह भूकंप इतना तीव्र है कि इससे समुद्र की गहराई में लहरें 900 किमी प्रतिघंटा तक पहुंचने का अनुमान है। इस तेज रफ्तार का असर कई किलोमीटर ऊपर महासागर की सतह पर दिखता है और ऊपरी लहरें कुछ फीट से कई मीटर तक ऊंची हो सकती हैं। हालांकि, इनकी रफ्तार 20 से 50 किमी प्रतिघंटा तक आ सकती है। 

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