फ़रवरी 4, 2026

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दिल्ली में इंसानों ने संभाली ‘इंद्रदेव’ की जगह! बुराड़ी में शुरू हुआ कृत्रिम बारिश का मिशन, कानपुर से उड़ा प्लेन कर रहा क्लाउड सीडिंग – जानें हर अपडेट

नई दिल्ली।
दिल्ली-एनसीआर में लगातार बढ़ते प्रदूषण स्तर को देखते हुए अब आसमान से राहत की उम्मीद कृत्रिम बारिश (Artificial Rain) से की जा रही है। मंगलवार को कानपुर से उड़ा सेसना विमान दिल्ली पहुंच चुका है और बुराड़ी इलाके के ऊपर क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अगर सब कुछ अनुकूल रहा तो शाम 5 से 6 बजे के बीच दिल्ली में कृत्रिम बारिश हो सकती है।


🌧️ प्रदूषण से राहत के लिए शुरू हुआ कृत्रिम बारिश मिशन

दिल्ली-एनसीआर में पिछले एक हफ्ते से वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) “गंभीर” श्रेणी में बना हुआ है। ऐसे में प्रदूषण पर काबू पाने के लिए दिल्ली सरकार और IIT कानपुर की संयुक्त पहल के तहत क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन शुरू किया गया है। यह पहली बार है जब राष्ट्रीय राजधानी में बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल रेन प्रोजेक्ट को अंजाम दिया जा रहा है।


✈️ कानपुर से उड़ान और दिल्ली तक का सफर

मंगलवार सुबह कानपुर से उड़ान भरने वाले विमान को मौसम के कारण कुछ देर इंतजार करना पड़ा। सुबह कानपुर में विजिबिलिटी 2000 मीटर थी, जबकि विमान के उड़ान भरने के लिए कम से कम 5000 मीटर विजिबिलिटी जरूरी थी। जैसे ही मौसम साफ हुआ, विमान ने दिल्ली की ओर उड़ान भरी और बुराड़ी, खेकड़ा, नॉर्थ करोल बाग, मयूर विहार, सड़कपुर और भोजपुर के ऊपर क्लाउड सीडिंग की गई। इसके बाद विमान मेरठ एयरबेस पर लैंड कराया गया।


☁️ क्या सफल होगी बारिश?

मौसम विभाग के मुताबिक, फिलहाल दिल्ली की हवा में नमी केवल 15 से 20 प्रतिशत है, जबकि कृत्रिम बारिश के लिए कम से कम 50 प्रतिशत नमी की आवश्यकता होती है। इसलिए बारिश होने की संभावना पर अब भी सस्पेंस बना हुआ है।
एनडीटीवी रिपोर्टर पल्लव बागला के अनुसार, यदि क्लाउड सीडिंग सफल रही तो शाम को 5 या 6 बजे के बीच उत्तरी और बाहरी दिल्ली के कुछ हिस्सों में कृत्रिम बारिश देखी जा सकती है।


🧪 कैसे होती है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग में सिल्वर आयोडाइड (AgI) और सोडियम क्लोराइड (NaCl) जैसे यौगिकों का छिड़काव विमान से किया जाता है। ये रासायनिक तत्व बादलों में मौजूद जलवाष्प को संघनित (condense) कर बूंदों में बदल देते हैं, जिससे बारिश शुरू हो जाती है। हालांकि, यह तकनीक बादल बनाती नहीं, बल्कि मौजूदा बादलों से बारिश कराने में मदद करती है।


🌍 दुनिया और भारत में कहां-कहां हुआ इस्तेमाल

  • दुनिया में सबसे पहले 13 नवंबर 1946 को अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. विंसेंट शेफर्ड ने इस तकनीक का प्रयोग किया था।
  • भारत में क्लाउड सीडिंग का पहला प्रयोग 1983 और 1987 में किया गया।
  • इसके बाद तमिलनाडु (1993-94), कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी इसका सफल प्रयोग हुआ।

💰 कितना आता है खर्च?

एक क्लाउड सीडिंग मिशन की लागत कई करोड़ रुपये तक होती है। इसमें विमान संचालन, केमिकल और तकनीकी उपकरणों का खर्च शामिल होता है।


🔍 आगे की योजना

अगर आज का प्रयोग सफल रहा तो दिल्ली सरकार इसे एनसीआर के अन्य इलाकों में भी लागू कर सकती है। इससे न केवल प्रदूषण में कमी आएगी, बल्कि जनता को दमघोंटू धुंध से राहत भी मिलेगी।


👉 नतीजा अब मौसम के हाथ में है। अगर नमी थोड़ी भी बढ़ी तो दिल्ली की सड़कों पर आज “इंसानों की कराई बारिश” देखने को मिलेगी।

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