“नीम के नीचे एक सपना”
छह साल का गोलू हर शाम उसी पुराने नीम के पेड़ के नीचे बैठा रहता था — जहाँ से अनाथालय की खिड़की दिखाई देती थी। उसे न माँ की गोद मिली थी, न पिता का कंधा। लेकिन आँखों में हमेशा एक सपना पलता था — “मैं भी कुछ बनूँगा।”
गोलू बोल नहीं पाता था, पर उसकी आँखें बहुत कुछ कहती थीं। जब भी कोई दानदाता आता, वो दौड़कर सबसे पहले लाइन में लग जाता, लेकिन सिर्फ इस उम्मीद में कि कोई उसके सिर पर हाथ रखे।
एक दिन, एक वृद्ध दंपती अनाथालय आए। उनकी कोई संतान नहीं थी। वे बच्चों को मिठाई बाँट रहे थे। गोलू ने धीरे-धीरे उनके पैर छुए, जैसे उसका दिल कुछ कह रहा हो।
दंपती रुके… उसकी मासूम आँखों में कुछ देख लिया उन्होंने।
“क्या नाम है तुम्हारा?” वृद्ध महिला ने पूछा।
गोलू ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी पुरानी कॉपी में एक चित्र दिखाया — जिसमें एक माँ, एक पिता और एक बच्चा नीम के नीचे मुस्कुरा रहे थे।
वो पल जीवन का मोड़ बन गया।
कुछ महीने बाद, वही नीम का पेड़ उसके घर के आँगन में था — अब वह अनाथ नहीं था। माँ की गोद और पिता का साया मिल गया था।
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