मई 16, 2026

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सरकार बनाम विपक्ष: क्या बर्खास्तगी वाला संविधान संशोधन बिल संसद से पास हो पाएगा?

नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की 30 दिन से अधिक की न्यायिक हिरासत पर स्वत: बर्खास्तगी का प्रस्तावित संविधान संशोधन बिल अब संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया है। समिति को शीतकालीन सत्र के पहले दिन अपनी रिपोर्ट देनी होगी, जिसके बाद संसद में इसे पारित कराने की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस बिल को पास करा पाएगी? संसद की मौजूदा संख्या शक्ति और राजनीतिक समीकरण को देखते हुए यह बेहद मुश्किल दिख रहा है।


विपक्ष का विरोध और तर्क

विपक्षी दलों ने इस बिल को असंवैधानिक बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज किया है। उनका कहना है:

  • यह बिल संघीय ढांचे पर हमला है।
  • भारतीय न्याय व्यवस्था का सिद्धांत है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो, कोई दोषी नहीं होता
  • मोदी सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल विपक्षी शासित राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए कर सकती है।
  • पिछले 11 सालों में जांच एजेंसियों का दुरुपयोग विपक्ष को निशाना बनाने के लिए हुआ है।

संसद का गणित: क्यों मुश्किल है बिल पास कराना?

संविधान संशोधन अनुच्छेद 368 के तहत होता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए:

  1. कुल सदस्यों का बहुमत (House Strength का 50% से अधिक)।
  2. उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत

लोकसभा

  • कुल सदस्य: 542
  • आवश्यक बहुमत: कम से कम 272 सांसद
  • यदि सभी उपस्थित हों, तो दो-तिहाई यानी 361 सांसदों का समर्थन चाहिए।

राज्यसभा

  • कुल सदस्य: 239
  • आवश्यक बहुमत: कम से कम 120 सांसद
  • यदि सभी उपस्थित हों, तो दो-तिहाई यानी 160 सांसदों का समर्थन चाहिए।
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एनडीए की स्थिति

  • लोकसभा में: 293 सांसद
  • राज्यसभा में: 132 सांसद

यानी सरकार दोनों सदनों में आवश्यक संख्या से पीछे है। कांग्रेस और अन्य बड़े विपक्षी दलों का समर्थन बिना यह बिल पास होना लगभग असंभव है।


राज्यों की मंजूरी भी अनिवार्य

चूंकि यह संशोधन संघीय ढांचे को प्रभावित करता है, इसलिए इसे संसद से पारित होने के बाद कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं में साधारण बहुमत से मंजूरी लेनी होगी।

  • अच्छी बात यह है कि अधिकांश राज्यों में एनडीए की सरकार है, इसलिए राज्यों से सहमति लेना बड़ी समस्या नहीं होगी।
  • लेकिन, संसद में विपक्ष का समर्थन लिए बिना आगे बढ़ना कठिन होगा।

सरकार की मंशा और राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस बिल के जरिए विपक्ष को “भ्रष्टाचार पर एक्सपोज़” करना चाहती है।

  • यदि विपक्ष समर्थन नहीं करता तो सरकार कह सकती है कि विपक्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में खड़ा है
  • यह कदम संसद में पारित होने जितना ही राजनीतिक संदेश देने के लिए भी अहम है।

संयुक्त संसदीय समिति में विपक्ष अगर शामिल रहता है तो वह सुझाव दे सकता है कि “न्यायिक हिरासत की बजाय केवल दोषसिद्धि पर ही बर्खास्तगी हो”, ताकि बिल न्यायिक मानकों के अनुरूप हो।


निष्कर्ष

संविधान संशोधन बिल का भविष्य संसद के अंकगणित पर टिका है। मौजूदा हालात में बिना विपक्ष के समर्थन के इसे पास कराना लगभग असंभव है। लेकिन यह साफ है कि सरकार ने इस कदम से विपक्ष पर नैतिक दबाव बनाने और जनता के बीच संदेश देने की रणनीति तैयार की है।

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