मोहन भागवत का संदेश: “देश को बड़ा बनाने के लिए सिर्फ नेताओं पर नहीं, समाज की सामूहिक भागीदारी जरूरी”
समाचार विस्तार:
नई दिल्ली, 27 अगस्त 2025। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित “100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज” विषयक तीन दिवसीय विशेष कार्यक्रम का मंगलवार को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने देश के भविष्य, समाज की भूमिका और राष्ट्र निर्माण को लेकर अपने विचार रखे।

भागवत ने स्पष्ट कहा कि केवल नेताओं, संगठनों या राजनीतिक दलों के भरोसे देश को महान नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा—“नेता और संगठन सहायक भर होते हैं, लेकिन असली परिवर्तन पूरे समाज की भागीदारी से आता है। अगर हमें भारत को बड़ा बनाना है, तो समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ आना होगा।”
समाज के गुण और अवगुण पर जोर
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में समाज के गुणात्मक विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में मौजूद दुर्गुणों को दूर किए बिना किसी भी उपाय का लाभ स्थायी नहीं हो सकता। “इतिहास गवाह है कि भारत पर बार-बार आक्रमण हुए और हम लड़ाई भी लड़ते रहे, लेकिन हमारी कमजोरियां और समाज के अंदर मौजूद अवगुण अक्सर हमें हार की ओर धकेलते रहे। इसलिए जरूरी है कि हम अवगुणों को त्यागें और गुणों को विकसित करें।”
भागवत ने कहा कि देश की स्वतंत्रता और विकास तभी स्थायी होगा जब समाज में गुणात्मक सुधार होगा और हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। उन्होंने कहा—“नीति, पार्टी, विचार, संगठन और सत्ता सब सहायक हैं, लेकिन परिवर्तन का असली कारण समाज की सामूहिक उन्नति है।”

नायक की परिभाषा और रविंद्रनाथ ठाकुर का हवाला
अपने भाषण में भागवत ने रविंद्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध निबंध ‘स्वदेशी समाज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में जागृति राजनीति से नहीं आती। ठाकुर ने कहा था कि समाज को बदलने के लिए स्थानीय नेतृत्व खड़ा करना जरूरी है।
भागवत ने समझाया कि समाज की उन्नति के लिए ऐसे नायक की आवश्यकता है—
- जिसका चरित्र शुद्ध और निष्कलंक हो,
- जिसका समाज से निरंतर संपर्क और जुड़ाव हो,
- जिस पर समाज का विश्वास हो,
- और जो अपने देश के लिए जीवन-मरण का संकल्प कर सके।
भागवत के अनुसार ऐसा नायक ही समाज को दिशा दे सकता है और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति दे सकता है।
संघ के 100 वर्ष और भविष्य की दृष्टि
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सौ वर्ष पूरे होने के बाद संघ अब नए क्षितिज की ओर बढ़ रहा है। यह समय केवल संगठन की उपलब्धियों का स्मरण करने का नहीं, बल्कि आने वाले शताब्दी की चुनौतियों को पहचानने का है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे केवल राजनीति या सत्ता पर निर्भर न रहें, बल्कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाएं।
मोहन भागवत का यह संबोधन इस बात का स्पष्ट संकेत था कि आने वाले वर्षों में संघ समाज में गुणात्मक सुधार और सामूहिक जिम्मेदारी के मुद्दों को प्राथमिकता देगा।
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