अब सस्ते होंगे ब्रांडेड कपड़े, फूड आइटम्स और सीमेंट! जीएसटी काउंसिल में बड़ा फैसला संभव, टैक्स स्ट्रक्चर होगा आसान
जल्द ही ब्रांडेड कपड़े और फूड आइटम्स खरीदना आम लोगों की जेब पर हल्का पड़ सकता है। अगले महीने 3 और 4 सितंबर को होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में टैक्स ढांचे में बड़े सुधारों पर फैसला लिया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार कपड़े और खाने के सामान पर जीएसटी घटाकर 5 प्रतिशत के स्लैब में लाने की तैयारी में है।

सरकार का मकसद: आसान टैक्स ढांचा
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार टैक्स स्ट्रक्चर को आसान बनाने की दिशा में काम कर रही है। प्रस्तावित सुधारों के तहत केवल दो स्लैब — 5% और 18% — रखे जाएंगे। वहीं, विलासिता वाली और हानिकारक वस्तुओं पर अधिकतम 40% जीएसटी लगाया जाएगा।
इस फैसले से रोज़मर्रा की कई चीजें सस्ती हो सकती हैं। विशेषकर ब्रांडेड कपड़े और खाद्य सामग्री पर टैक्स घटने से उपभोक्ताओं को सीधा फायदा मिलेगा।
किन चीजों पर बदल सकते हैं रेट?
- कपड़े और फूड आइटम्स → 5% जीएसटी स्लैब में
- सीमेंट → 28% से घटकर 18%
- सैलून और ब्यूटी पार्लर सेवाएं → 18% से घटकर 5%
- एसी, टीवी, रेफ्रिजरेटर जैसी वस्तुएं → 18% स्लैब में रखे जाने का प्रस्ताव
- हेल्थ इंश्योरेंस → 18% से घटाकर शून्य करने की संभावना
राज्यों की चिंताएं भी अहम
काउंसिल की बैठक में सभी राज्यों के वित्त मंत्री शामिल होंगे। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल ने सुझाव दिया है कि अधिकतम जीएसटी दर को 40% से भी ऊपर ले जाया जाए। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना बाजार के लिए गलत संकेत होगा और इसके लिए कानून में संशोधन भी करना पड़ेगा।
इसके अलावा, राज्यों की सबसे बड़ी चिंता रेवेन्यू लॉस की है। टैक्स दरों में कटौती के बाद राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी, इस पर भी काउंसिल में चर्चा होगी।

उपभोक्ताओं को मिलेगा सीधा लाभ
अगर यह प्रस्ताव पास होता है तो आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। जहां कपड़े और खाने-पीने के सामान सस्ते होंगे, वहीं सीमेंट और इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतों में भी कमी आ सकती है। इससे आम उपभोक्ता से लेकर रियल एस्टेट सेक्टर तक को राहत मिलेगी।
निष्कर्ष
अगले महीने होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक आम जनता के लिए बड़ी सौगात लेकर आ सकती है। अब देखना होगा कि क्या केंद्र और राज्य मिलकर इस सुधार को हरी झंडी देते हैं या फिर राज्यों की रेवेन्यू चिंता इस राह में अड़चन बनती है।
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